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डॉ.सुभाष भदौरिया की ग़ज़लें एवं व्यंग्य लेख.

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ग़ज़ल तेरे वादे पे जिया करते हैं. हम भी क्या रिस्क लिया करते हैं. हम को रखते हैं सदा वेयटिंग में, सब को कनफर्

काट कर सर मेरा मुस्कराते हैं वे.
काट कर सर मेरा मुस्कराते हैं वे. magnify
उपरोक्त तस्वीर उत्तर केरल कन्नूर जिले के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन के कार्यकर्ता की है जो जिले की की सी.पी.एम. शाखा के हत्थे चढ़ गया . मैंने इसे एवं अन्य तस्वीरों को http://pramendra.blogspot.com/ पर देखा http://ckshindu.blogspot.com/2008/03/blog-post_19.html पर भी इसका उल्लेख है.
ये कटे सर की ग़ज़ल है जो कट तो गया पर झुका न होगा वैसे आजकल बेसरों का जमाना है फूलों और तितलियों के रंगों के फिदायीन जख्मों का लुत्फ़ क्या जाने. वे इसकी तफ़्तीश में लगे हैं ये सर असली है या नकली और हम हैं कि रात भर सो न सके और खुद में महसूस कर रहे हैं पूरी शिद्दत के साथ.
ग़ज़ल
काट कर सर मेरा मुस्कराते हैं वे.
दुश्मनी इस तरह से निभाते हैं वे.

कोई सर न उठाये कभी भूल कर,
बीच चौराहे उसको सजाते हैं वे.

कोई सीखे हुनर उनके हाथों से अब,
ख़ास कारीगरी अब दिखाते हैं वे.

हुक्मरानों की साज़िश जरा देखिये,
ज़ुल्म की पीठ को थप-थपाते हैं वे.

कातिलों के भी कांधे पे है एक सर,
इस हकीकत को क्यों भूल जाते हैं वे.

अब रंगों में कहाँ रह गया है असर,
खून की देखो होली मनाते हैं वे.



Friday March 21, 2008 - 06:14am (GMT) Permanent Link | 2 Comments
बाद मुद्दत के फिर हम जवां हो गये.
बाद मुद्दत के फिर हम जवां हो गये. magnify

.बी.सी.4 मार्च 2008 से उपलब्ध ये तस्वीर पाकिस्तान की जेल में 35 साल रहे कश्मीरसिंह की है जिन्हें जासूसी के इल्ज़ाम में फांसी की सज़ा दी गयी थी.मानव अधिकार संगठनो की कोशिश से राष्ट्रपति मुशरर्फ ने फांसी की सज़ा मांफ कर दी. बाघाबार्डर पर एक जमाने के बाद जब वे अपनी पत्नी से मिले तो दोनो कभी हंसते कभी रोते. कश्मीरसिंह को पाकिस्तान की जेल में इब्राहीम के नाम से जाना जाता था. वे क्या से क्या हो गये इसी अहसास को यहाँ बयां करने की कोशिश की गयी है.

ग़ज़ल

ग़म के चेहरे पे गहरे निशां हो गये.

अपने दुश्मन भी अब महरबां हो गये .

आप का हुस्न जाने कहाँ खो गया,

देखो हम भी तो बूढे मियां हो गये.

हम बहारों की मानिंद रुख़सत हुए,

आज लौटे तो देखो ख़िज़ां हो गये.

मौत ने हम को दस्तक कई बार दी,

आप ही मौत के दरमियां हो गये.

मेरी जाने ग़ज़ल तुम से मिल के लगा,

बाद मुद्दत के फिर से जवां हो गये.

डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.ता.08-03-08

Saturday March 8, 2008 - 02:44am (GMT) Permanent Link | 1 Comment
दिन दहाड़े वो डाका डालेगा.
दिन दहाड़े वो डाका डालेगा. magnify

ग़ज़ल

दिन दहाड़े वो डाका डालेगा .

बाद में मुझको वो संभालेगा .

लाख बचने की मैं करूँ कोशिश.

बातों बातों में वो मना लेगा .

पहले बाहों में आसरा देगा,

बाद में गेंद सा उछालेगा .

मेरे सीने पे अपना सर रखकर,

बालकों से वो शौक पालेगा .

है मचलना तो मेरी फितरत में,

हाथ क्या दिल भी वो जला लेगा.

मुझ से बिगड़ी तो कोई बात नहीं,

वो किसी और से बना लेगा .

है गुनाहों का देवता मेरा ,

अपने ख्वाबों मे वो बुला लेगा.

डॉ. सुभाष भदौरिया अहमदाबाद,

Saturday February 23, 2008 - 06:51am (GMT) Permanent Link | 1 Comment
चुहियों की चूँ-चूँ बिल्लों की खों-खों.
चुहियों की चूँ-चूँ बिल्लों की खों-खों. magnify

चुहियों की चूँ---चूँ बिल्लों की खों---खों.

आज नेट पर आकर देखा तो चारों तरफ से चूँ-चूँ और खों-खों की आवाज़े आती सुनाई दी पहले चूँ- चूँ की आवाज़ का जाइज़ा लिया तो ज्ञात हुआ कि एक मंच पर कुछ पढी लिखीं चुहियाँ बिराजमान है कुछ साधू बिल्ले बीच में बैठे मंद मंद मुस्करा रहे हैं.सामने श्रोतागण कोई नज़र नहीं आता.गरीब और मेहनतकश चुहियों को इतनी कहाँ फुरसत की फालतू के गाल बजायें वे अपने काम में लगी हुई हैं. बैटे ठाले की पंचाइत में वे नहीं पड़ती.(प्रथम दृश्य का आरम्भ एक बंगले में महफिल लगी हुई है.)

मंच पर बड़ी गहमा गहमी चल रही है.एक सीनियर चुहिया जिसे सब मेम मेम कह रहीं हैं बड़े तैश में है. कहती है मेरी प्यारी बहनो बिल्ले हमें सदियों से शिकार करते आ रहे हैं. हमें गुलाम बना रक्खा है. हम कब तक जंजीरों में यों ही जकड़ी रहेंगी .आओ हम इन जंजीरों को तोड़ डाले और बिल्लों को सबक सिखायें. पर खतरा हमें बाहर से नहीं अंदर से ही है. अभी साधू बिल्लों ने एक हमारी ही साथिन को पुरस्कार दिया तो हम लोगों में से कुछ ने जलकर उसका विरोध किया.ये ठीक नहीं है --------

एक कटखनी चुहिया बीच में ही बोल पड़ी सोरी मेम बिल्लों का वो जातीय विभाजन मुझे ठीक नहीं लगा था.

शटअप मंच पर बैठी सीनयर चुहिया चीख पड़ी. तुम मुझे पढ़ा रही हो.नानी के आगे नन्होरे की बातें करती हो. अपने आप से पूछो कि तुम्हें पुरस्कार मिलता तो तुम दौड़ी चली जातीं तुम्हारी पीड़ा यही थी. तु्म्हारी हर जगह काटने की आदत बहुत खराब है. बदमाश बिल्लों से हम बाद में निपटेंगी पहले सब मिलकर तुम्हारे ही दांत तोड़ेंगी.

सोरी मेडम कटकनी चुहिया चुप हो गयी.

फिर एक हट्टी कट्टी चुहिया चिल्लाई उस डाकू बिल्लें को किसने आमंत्रित किया था.आगया कमबख्त लिस्ट लेकर हमें कैसे पतित होना है की सीख देने.

अरे हम रस मलाई हैं कि लार टपकाने लगे सभी.उसने सोचा उसके भोंपूबेन्ड में एक और भोपूं बढेगा आ गया गद-गद होकर नसीहत देने.

फिर कटखनी चुहिया बोली उस भोपूं बैंन्ड में है क्या ? पूरा लुच्चों का लश्कर है कहते हैं कि चंद दिनों में अपनी सरकार बनाने नाले हैं. जीना हराम कर रक्खा है. पापियों ने.गालियों के सिवा दूसरा है ही क्या.

इसका मतलब तुम भी उनके डेरे पर जाती हो.

एक गंभीर चुहिया ने कहा.देखो वे लुच्चे नहीं उच्च कोटी के संत हैं उनकी कुंडलनी जाग गयी है.

योगी परम अवस्था में इसी तरह की भाषा बोलते थे. हमें साधू और डाकू सभी बिल्लों से ताल मेल बिठाकर रखना चाहिए तभी हम आगे बढ़ सकते हैं-----

मंच पर बैटी सीनियर चुहिया फिर गरजी. अरे हम कहाँ तलवार लेकर उनकी गरदन काटने जा रही हैं और जब तक तुम्हारे जैसी हम-दर्द बैठी हैं तब तक वे हमारा यों ही शिकार करते रहेंगे. हम तो उनके गले में घंट बाँधना चाहती हैं कि हम चौकन्नी रह सकें हमारी आने वाली नस्लें उन से बच सकें.

सीधी-सादी चुहिया खिसयाकर चल दी.

कटकनी चुहिया फिर बोली पहले उस डाकू बिल्ले को भगाओ वो हमें एक एक कर चट करेगा. उसकी लार कैसी टपक रही है.हमारी पतित होने की पुकार पर सामूहिक भोजन का प्लान बना रहा होगा दुष्ट,पापी, नर्क का कीड़ा पहले उसे भगाओ वो भी उठ खड़ी हुई.

तभी एक गंभीर आवाज़ में एक चुहिया बोली हम चुहियों के कार्य भी कहाँ गंभीर हैं हम अपने काम में सीरियस नहीं हैं.खाली बिल्लों को कोसने से क्या होगा हमें अपना आत्म-मूल्यांकन भी करना चाहिये. बिल्लों के टेलेन्ट से मैं वाकिफ हूँ.मैंने उनकी विज़िट ली है बड़े ही उम्दा जज़्बात के मालिक हैं तुम जिन्हें डाकू या बदमाश बिल्ला समझ रही हो वे पहुँचे फकीर है.सीधी सच्ची बात तल्खियों में कहते हैं. तुम साधू बिल्लों के कीर्तन पर मुग्ध हो.तु्म्हारी नज़र कमज़ोर हो गयी है ऐसा मुझे लगता है.

गेट आउट ये कौन आयी नयी नयी हमें सिखाने. मंच की सीनियर चुहिया अपना ऐनक ठीक करती हुई चीखी..नई नई किताब मेले में से तस्लीमा नसरीन पढ़के आयी है शेखी बघारने. जा शामिल हो जा तू भी उन पापियों के साथ.

एक कहती थी कि मेरा मानसिक स्वास्थय ठीक नहीं दुसरी कहती है नज़र कमज़ोर.

पास ही बैठे एक कबीर नामके बिल्ले ने मुस्कराकर कहा तो दिखालो ना किसी स्पेसालिस्ट को.सभी का डाउट किलियर हो जाये. वैसे भी एक उम्र के बाद चैकप कराते रहना चाहिए.फिर साधू बिल्ला भागता है उसको एक सुंदर पर बेवकूफ चुहिया का फोन आया खास अपायनमेंट हैं.

डाकू लूट के खाते हैं साधू फुसला के.

(एक एक कर सारी चुहिया चली जाती हैं. दूसरे साधू बिल्ले भी भाग लेते हैं.सीनियर चुहिया मनन कर रही है कि डाक्टर को दिखाउँ या यों ही बवाल मचाऊँ. पहला दृश्य पूरा.)

(दूसरा दृश्य डाकू झपटसिहं बिल्ले का दरबार सामने मेज पर बोतल सिगरेट और अगेरह बगैरह- डाकू सरदार झपट सिहं बिल्ले के मुँह से फेंन गिर रहा है चुहियों को पतित होने के गुरु सिखाने जाने पर सब चुहियों ने रगेड़ा अकेले गये थे रस मलाई खाने जान बचा कर भागे चुहियों के कई निशान जिस्म और जहन पर हैं.)

सभी डाकू बिल्ले पूछते हैं. वापिस आ गये सरदार खाली हाथ. हम सोच रहे थे कि दो चार तरो ताज़ा चुहियों को भी लेते आओगे.हमारे लिए.

झपटसिहं- अबे डाक्टर दवा लगा बहुत गहरे जख्म है एक हट्टी कट्टी चुहिया पिल पड़ी फिर दूसरी तीसरी बड़ी मुश्किल से जान बची.हाय मार डाला लुच्चियों ने.

पर काहे को गये थे ज्ञान बघारने अपने डेरे पे ही रेंक लेते.क्यों हम सब की फज़ीहत कराते हो.एक समझदार बिल्ले ने कहा.

अरे हम आयडिया देने गये थे हाऊ टू बी पतित. तुम सब के फायदे के लिये.

हम सब के फायदे के लिये अकेले गये थे गुरू हम सबको चरका देते हो. पहले ही वो गंगा भौजी ने सबके बांस कर रखा है उसके वियोग में कैसे रो रहे थे फें फें कर के.

जाओ चली जाओ हमें छोड़कर पारो---हम तुम्हारे बिना जी लेंगें.गरू तुम्हारी लीला हमी जानते हैं. निशाना बराबर लगा दिये.

और गंगा भौजी ने ठान ली पापियों का उद्धार कर के ही मानेंगी.

अबे डाक्टर वो लहसुन-बटी ला. डाक्टर लहसुनबटी देता है.डाकू बिल्ला झपटसिंह एक साथ कई गोलियां शराब के साथ निगल लेते हैं.

सरदार अकेले अकेले खा रहे हो . ये लहसुन बटी की क्या तासीर है हमें भी बताओ.

अबे मूर्खो लहसुन वटी की तासीर पूछते हो-गरमा गरम वियाग्रा से भी बढ़कर अपने डाक्टर साहब बतावे हैं .अपने गिरोह में आने वाली भौजी के लिये फिट हो रहा हूँ.

गिरोह के दूसरे बिल्ले दबी ज़बान में बात करते हैं.अब पता चला दादा गिरोह की भौजी के लिये क्यों भैरा रहे हैं.रात में भी भौजी भौजी चिल्लाते हैं सब घर में टेंसन कर रहे हैं क्या लफड़ा है यार ये डाक्टर ने खिला खिला लहसुन वटी मति खराब कर रखी है देखना भौजी के लिये कहीं गृहयुद्ध न छिड़ जाये.

अबे भौजी ढूढ़ो जल्दी सालो नहीं तो तुम्हारे किसी के ऊपर ही लहसुन बटी का प्रेक्टील करुँ दिन दहाड़े. पेलूँ अभी एकाद को.

अरे यार भागो चढ़ गयी है सरदार को कहीं सही में प्रेक्टीकल न कर बैठे. एक लहसुन बटी का जादू, दूसरे गंगा भौजी का ग़म तीसरे हट्टी-कट्टी चुहिया की रगड़ाई. बहुत टेंसन हो गया है बास को.

एक तरफ चुहियों की चूँ चूँ और बिल्लों की खों-खो से फिज़ा में में रंगीनी आयी हुई है पहले कुत्ते का रुदन और हंस का डिस्को हुआ देखें निम्न लिंक पर देखे.

http://subhashbhadauria.blogspot.com/2008/01/blog-post_13.html

हमने सोचा ग़जलें छोड़ो कुछ और कहो.बकौले दुष्यन्त कुमार-

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई जमीन नहीं.

ग़जब तो ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं.

मैं बेपनाह अंधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ,

मैं इन नज़ारों का अंधा तमाश बीन नहीं.

डॉ.सुभाष भदौरिया,अहमदाबाद-ता.22-02-08समय-6-00PM

Friday February 22, 2008 - 01:45pm (GMT) Permanent Link | 0 Comments
फ़ौजों को जल्द भेजिये लोगों के वास्ते.
फ़ौजों को जल्द भेजिये लोगों के वास्ते. magnify

ग़ज़ल

जो कह रहे थे देश से वे हैं महाऱथी.

होगी लड़ाई दुश्मनों से आर पार की.

समझौता एक्सप्रेस में दिलचस्प सफ़र कर,

चूहों ने घुस के संसद में रेड मार दी.

दामाद की तरह से बिठाकर के प्लेन में,

सरहद के पार छोड़ के आये थे जो कभी.

गोला जो पाक का कभी कश्मीर पे गिरा,

दिल्ली में उनकी देखिये पतलून भीग ली.

आसाम, झारखंड, महाराष्ट्र जल रहा,

अपने ही घर में हो गये हम,अब तो बाहरी.

फौजों को जल्द भेजिये लोगों के वास्ते,

गुंडो की वो ही अब तो उतारेंगे आरती.

गांधी, सुभाष भगत की वो बात हैं कहाँ,

इन बुज़दिलों ने मुल्क की मिट्टी खराब की.

डॉ.सुभाष भदौरिया,ता.13-02-08 समय-10-20PM

Wednesday February 13, 2008 - 05:36pm (GMT) Permanent Link | 0 Comments

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