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Dr.Kavita Vachaknavee

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"यत्र विश्वम् भवत्येक नीडम्" कला,संस्कॄति,साहित्य(हिंदी कविता,कथा,निबंध,उपन्यास,लेखक,समीक्षा) भाषा, भारत,जीवनमूल्य

Entry for May 03, 2008

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Saturday May 3, 2008 - 04:58am (IST) Permanent Link | 0 Comments
वैसाखी, यमुना और बच्चे
वैसाखी, यमुना और बच्चे
ललित निबंध
डॉ. कविता वाचक्नवी





गर्मी अभी जलाने वाली नहीं हुई थी। आँगन में सोना शुरू हो चुका था। आँगन इतना बड़ा कि आज के अच्छे समृद्ध घर के दस-ग्यारह कमरे उसमें समा जाएँ। एक ओर छोटी-सी बगीची थी। आँगन और बगीची की सीमारेखा तय करती, तीन अँगुल चौड़ी और आधा बालिश्त गहरी, एक खुली नाली थी, जिसे महरी सींक के झाड़ू से, आदि से अंत तक एक ही 'स्ट्रोक' में साफ़ करती आँगन की दो दिशाएँ नाप जाती थी। नीचे हरी-हरी काई की कोमलता, ऊपर से बहता साफ़ पानी...। मैं कल्पना किया करती कि चींटियों के लिए तो यह एक नदी होगा... और मैं चींटी बन जाती अपनी कल्पना में। फिर उस नन्हें आकार की तुलना में इस तीन अंगुल चौड़ी नाली के बड़प्पन की गंभीरता में, एक फ़रलांग की दूरी पर बहती यमुना याद आती। ...याद आता उसके पुल पर खड़े होकर नीचे गर्जन-तर्जन, भँवर, पुल के खंभों का दोनों दिशाओं में काफी बाहर की ओर निकला भाग, उनसे टकराती, बँटकर बहती धाराएँ। पुल पर खड़े-खड़े मैं इतना डूब जाती थी कि लगता पुल बह रहा है और मैं निरंतर आगे-आगे बहे जा रही हूँ...जंगला थामे खड़ी। आज भी डर लगता है। मैं जिसे भी यह समझाने की कोशिश करती, सब हँसते। इसीलिए जब कभी वहाँ से गुज़रती, एकदम बीचोबीच होकर पुल के किनारों की ओर चलने में मुझे हर समय भय लगता। आज भी वैसा ही है। सड़क के बीच 'डिवाइडर' पर खड़े होकर 'ट्रैफ़िक' रुकने की प्रतीक्षा करनी पड़े तो चक्कर आ जाता है... गिर ही जाऊँ, इसलिए उस से सटकर नीचे सड़क पर ही खड़े होना बेहतर लगता है।
नाली को नदी और स्वयं को चींटी बनाकर जाने कितनी बार मैंने नाली सूखने की प्रतीक्षा की होगी। और यह वह ऋतु थी जब दोपहर दो बजे तक के रसोई के कामकाज निपटने के बाद पाँच बजे तक नाली आराम करती-करती ऐंठना शुरू हो जाती। अप्रैल से ज्यों-ज्यों धूप बढ़ने के दिन आने लगते, दोपहर बाद ही से नाली का हरित-सौंदर्य बुढ़ापे की खाल-सा सूखा व बेजान होकर दीवारों से अंदर की ओर मुड़ने लगता। पपड़ियाँ बनकर तुड़ाते-मुड़ते वह मुझे विचलित करता रहता। मुझे पानी के नीचे काई के लंबे-लंबे हरे तंतु कोमलता से बहते ऐसे लगा करते थे, जैसे नदी की धार के विपरीत मुँह करके सिर का पिछला भाग पानी में ढीला छोड़ देने पर लंबे-लंबे बाल सुलझे-से होकर धार में लहराते-तिरते हैं। पर अप्रैल आते-आते नाली कुरूप हो जाती।
नदी और नाली! कोई संयोग नहीं। कोई मेल नहीं। बिल्कुल ही बेमतलब बात हो गई। होली में नाली रंग-बिरंगी हो जाती, उस पर स्वच्छ पानी बहता तो उसमें होली के छींटें देख मुझे हरी घास पर गिरे, बिखरे फूलों की रंगीन पाँखुरियाँ याद आतीं। (पर आज यह सब क्यों याद आ रहा है?) तो यों, होली व बैसाखी आकर नाली के 'रंग-ढंग' बदल जातीं। जब कभी घर में पुताई होती, नाली उसमें भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती, बिना हील-हुज्जत के। इस नाली को नदी का रूप तब और भी मिलता, जब आती वैसाखी। हमारे यमुना की रेत में पगे कपड़े पछारकर, पानी सारी रेत नाली के छोर पर छोड़ देता- तो और भी असली रूप लगता उसका। किताबों में 'डेल्टा' पढ़ा-ही-पढ़ा होगा उन दिनों, क्योंकि 'डेल्टा' का रूप भी मैंने नाली के उल्टे बहाव की कल्पना करके वहीं समझने की कोशिशें की थीं- हमारे बीस लोगों के परिवार के कपड़ों की रेत खाई बैसाखी की दुपहरी की नाली में।
आज फिर बैसाखी है। पर वे दिन अतीत बन गए हैं। 'केबल' का एक 'चैनल' 'दरबार-साहब' (स्वर्ण-मंदिर) से गुरुबाणी का सीधा प्रसारण 'फेंक' रहा है। मन में बैसाखी उमगती ही नहीं अब। उमगती हैं- केवल यादें, जिनसे जोड़-जोड़ कर मैं आज के बच्चों के लिए पश्चाताप से उमड़ती-तड़पती रहती हूँ। कितनी चीज़ों से वंचित हैं ये। न ये खुली नाली वाले आँगन जानते हैं, न छतों पर सोना, न आँगन में देर रात तक चारपाइयाँ सटाए खुसर-पुसर बतियाना, न गर्मी में बान की चारपाई पर केवल गीली चादर बिछा कर सोने का मज़ा, न सत्तू का स्वाद, न कच्ची लस्सी, न कड़े के गिलास, न चूल्हे की लकड़ियों के अंगार पर फुलाई गरमागरम पतली छोटी चपातियाँ, न भूसी में लिपटी बर्फ़ की सिल्ली से तुड़वाकर झोले में टपकाते लाई बर्फ़, जिसे झोले सहित गालों से छुआया जा सकता है और ज़्यादा ही शैतानी की नौबत आ जाए तो चुपके से, घर पहुँचने से पहले, चूसा भी जा सकता है, न गर्मियों में सूर्यास्त के बाद ईंटों जड़े आँगन में बाल्टियों से पानी फेंकना, ताकि खाना खाने और सोने के लिए आँगन में चारपाइयाँ डाली जाने से पूर्व 'हवाड़' निकल जाए और ठंडा हो जाएँ, न इस प्रक्रिया में जहाँ-तहाँ खड़े होकर अपने बाल्टी भर-भर पानी उड़ेलने, भीगने व भागने की आज़ादी का रोमांच व मज़ा। ये तो बंद बाथरूम में नहाते हैं- शयनकक्ष के भी भीतर। कभी-कभी मौका लगता तो ४०-४५ फुट लंबे चिकने बरामदे में खूब पानी फैलाकर फिसला-फिसली का खेल या 'खुरे' की नाली में कपड़ा ठूँस कर डेढ़ बालिश्त गहरी तलैया का मज़ा, जिसमें एक-दूसरों पर खूब पानी फेंकने, धक्का-मुक्की करने और हाथों की छपाकियों से पानी उड़ाने.....हो-हल्ला करने से बाज़ नहीं आते थे हम। मैं अपने बच्चों के लिए कलपती हूँ कि कितना कुछ नहीं देखा इन्होंने। हमारा बचपन भी इन बच्चों की विरासत में न आया। इन सारी कारगुज़ारियों में हैंडपंप और टोंटी, दोनों ही पानी का अवदान देते न अघाते। दोनों 'खुरे' के भीतर मुख किए आमने-सामने डटे थे। इतना सब होते-हवाते 'हैंडपंप' का पानी इतना ठंडा हो जाता कि एक गिलास पीने में दाँत 'ठिर' (ठिठुर) जाते। आज 'बोर-वेल' के पानी के 'टैस्ट' करवाने के बावजूद हाथ के नल्के की गुंजाइश नहीं मिलती, मोटर से चलाते हैं और पीने में घबराते हैं।
हमारे लिए वैसाखी कमरों से शाम की मुक्ति के पर्व मनाने आती थी। दादी जी, जिन्हें हम 'भाब्बी जी' कहकर बुलाते थे, पिछली ही रात ताकीद कर देतीं, ''कुड़ियों! जे सवेरे जमना जी जाणा होए ते रात्री छेत्ती सो जाणा, गल्लां वा करदियाँ रहंगा। छड्ड जाणै नईं ते आप्पां - जे नाँ उठ्ठियाँ ते।'' (अर्थात- लड़कियों! यदि न उठीं तो हम घर में ही छोड़ जाएँगे।) दादी जी दुल्हन बनकर नन्हीं-सी बालिका के रूप में ही इस घर आई थीं। परिवार की सबसे बड़ी वधू। सास थी नहीं। तीन-तीन गबरू-गँवार और 'पेंडू' देवर। पहला संबोधन इस खानदान में आते ही दादी को 'भाब्बी' का मिला। उन्हीं की देखा-देखी अपने बच्चे भी 'भाब्बी' कहते। हमें झाई जी ने 'भाब्बी जी' कहना जीभ पर चढ़वाया।
सुवख्ते मुँह-अंधेरे उठ जाती थीं भाब्बी जी, वड्ढे झाई जी, विजय, दीदी (बुआ), पम्मी, चाची जी, मैं कद्दू (छोटे भाई का प्यार का नाम) और चाचा लोग। हालाँकि बिस्तर से उठने की ज़री इच्छा नहीं होती थी। हम हर बार कहते- ''असीं नईं जाणाँ'' (हमें नहीं जाना)। दीदी कहतीं, ''फेर रोवोगियाँ'' (बाद में रोती रह जाओगी) और अपनी पतली-पतली नाज़ुक उँगलियों वाले नन्हें-नन्हें हाथों से हमें गुदगुदी करके उठा देतीं। झोलों में पिछली रात ही कपड़े वगैरह भर लिए जाते थे। हम तीनों बच्चे अधमुँदी आँखों से खीझे-खीझे, नाक और गालों को ऊपर चढ़ाए ऊँह-ऊँह, डुस-डुस करते, हाथ पकड़े हुए, लगभग लाद-लूदकर ले जाए जाते। तारे अभी आकाश में होते थे। हम में से कोई पूछता, ''जमना किन्नी दूर हैगी अजे?'' (यमुना अभी कितनी दूर और है)। भाब्बी जी डपटतीं, ''सौ वारी सखावै, जमना 'जी' आक्खी दै। चज्ज नल नाँ वी लित्ता नईं जांद्दा, ते चल्ले ने वसाखी न्हाणं'' (सौ बार सिखाया है, जमुना 'जी' कहते हैं, ठीक से नाम भी नहीं लिया जाता और चले हैं वैसाखी नहाने)। वहाँ पहुँच डुबकियाँ लगाती भीड़, दूर दूसरी ओर नहाते पुरुष, महिलाओं-बच्चों का शोरगुल... सारी नींद उड़ा देता। धीरे-धीरे, सहमते-सहमते हाथ पकड़कर 'जमना जी' में उतरना, पैर रखते ही रेत का दरक जाना, या पैर का धीरे-धीरे और-और अंदर गड़ना, डराने के लिए काफी होता। ठंडा पानी छू-छू कर हमारे दुस्साहस को उकसाता। हमें तो कपड़े पहने ही पानी में उतरना होता था। ब्याहता स्त्रियाँ कंधों के नीचे बगलों में पेटीकोट बाँध लेतीं। ढँकने योग्य भाग ढँक जाता, लगभग घुटनों तक का। हम सभी घेरा बनाकर एक-दूसरे के हाथ पकड़ लेते। एक साथ पानी के भीतर जाते एक साथ उठ खड़े होते। कूल्हों तक के पानी में उतरना निरापद माना जाता था। वैसे आसपास भीड़ के कारण यों भी डर कम रहता। इतने पानी के माप में पहुँचना यानी यमुना के मध्य भाग के एक ओर का तीसरा भाग। हम लोग, यानी बच्चे, तो फिर पानी से निकलने का नाम ही नहीं लेते थे। पौ फटने को होती तो सब लोग जल्दी मचाते और हम में से कोई तर्क देता कि अभी तो उँगलियाँ भी बूढ़ी नहीं हुई हैं। पेल-पाल कर हमें निकाला जाता। घर से फर्लांग भर ही दूरी थी, अतः हमें वहाँ खुले में कपड़े नहीं बदलने दिए जाते थे- हम चाहते भी यही थे। उन्हीं भीगे टपकते कपड़ों में चमकीली, हल्के हरे-नीले रंग की रेत आँज कर, रेत सनी चप्पलें पहने घर लौटते।
वैसाखी के सारे आयोजनों में इतना-भर मतलब का लगता। बाकी दिन क्या पका, क्या हुआ, वह कुछ भी नहीं लगता। या याद हैं तो ''जट्टा आई वसाखी'' का गीत और पंजाबी भंगडे-गिद्दे, 'वारणे' के छोटे-छोटे फ्लैश। अब घर जाते हुए दिल्ली में बस की खिड़की से झाँकने पर यमुना का पराई-सी लगना तो दूर, यमुना रही ही नहीं, दीखती है। नीचे नदी में किसी खड्डे में मैले पानी का ज़रा-सा जमाव है बस। यमुना का अपना पानी कहीं नहीं सूझता है। नगर के लिए वह 'सीवर-लाइन' फेंकने का गड्ढा-भर है। अभी कुछ साल पहले दिल्ली में एक स्कूल-बस के यमुना में गिरने से बच्चों की मौत का भयानक समाचार कई दिन की दहशत भर गया था। देश में यमुना से इतनी दूर के हिस्से में बैठे, न अपनी स्मृतियों की यमुना से यह मेल खाया, न दुर्घटना से पहले देखी यमुना के उस रूप से, जिसमें पानी नदारद था और ट्रकों से रेत लादने के लिए उन्हें सूखी नदी में उतारा गया था।
वैसाखी अब फिर आई है। मुझे अपने पैतृक नगर अमृतसर के सरोवर और जलियाँवाला बाग़ के लाश-भरे कुएँ के साथ-साथ अपनी यमुना की यादें ही आती है। और इन्हीं के सहारे वैसाखी बीत गई है।
यमुना की एक रूप टोकरी में कृष्ण के साथ जुड़ा है... बालक कृष्ण को बचाने वाली यमुना। रंग-स्थली यमुना का एक दूसरा रूप है, 'निराला' की 'यमुना के प्रति' की यमुना का भी एक रूप है और एक रूप मेरी यादों में बसी यमुना का है।
पर मेरे बच्चों के पास यमुना की कोई याद नहीं। इनमें से कोई कान्हा के गीतों वाली यमुना को कैसे तलाशेगा? कैसे लिखेगा कोई 'यमुना के प्रति'? वैसाखी की असली संजोने लायक स्मृतियाँ बनी ही नहीं इनकी। हाँ, इस युग में स्कूल-बस यमुना में गिरने से पूरी बस के बच्चे मारे अवश्य गए थे- इतना तो अख़बार और इतिहास याद रखेंगे। मैं नहीं जानती मरा कौन है। क्या यमुना? क्या बच्चे? क्या स्मृतियाँ? क्या भविष्य? या बचपन? स्मृति विहीन भविष्य के लिए कौन कान्हा गुँजा सकता है बंसी की धुन? या कैसे बजेंगी झाँझरें रुनझुन? हमारी पाँचवी कक्षा की पाठ्य-पुस्तक वाली वह कविता तो पच्चीस वर्ष पहले से ही हटा दी गई है। सुनाऊँ? ''यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे, मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरेले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली, किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।''औरों को भी याद आती हो यह शायद!!
१४ अप्रैल २००८
Tags: वैसाखी, यमुनाऔर बच्चे
Tuesday April 15, 2008 - 01:17am (IST) Permanent Link | 0 Comments
‘केदार सम्मान’ २००७ के लिए निर्णय सम्पन्न

‘केदार सम्मान’ - २००७ निर्णीत



‘केदार शोध पीठ न्यास’ बान्दा द्वारा सन् १९९६ से प्रति वर्ष प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिए जाने वाले साहित्यिक ‘केदार-सम्मान’ का निर्णय हो गया है। वर्ष २००७ का केदार सम्मान कवयित्री सुश्री अनामिका को उनके काव्य-संग्रह ‘खुरदरी हथेलियाँ ’ के लिए प्रदान किए जाने का निर्णय किया गया है।

यह सम्मान प्रतिवर्ष ऐसी प्रतिभाओं को दिया जाता है जिन्होंने केदार की काव्यधारा को आगे बढ़ाने में अपनी रचनाशीलता द्वारा कोई अवदान दिया हो। प्रकृति-सौन्दर्य व मानवमूल्यों के प्रबल समर्थक कवि केदारनाथ अग्रवाल की ख्याति उनकी कविताओं के टटकेपने व अछूते बिम्बविधान के साथ साथ कविताओं की सादगी व सहजता के कारण विशिष्ट रही।


‘केदार शोध पीठ न्यास’ केदार जी के काव्य अवदान को आगामी पीढ़ी तक पहुँचाने व उनमे काव्य के उस स्तर की पहचान विनिर्मित करने के उद्देश्य से गठित की गई संस्था है। प्रति वर्ष सम्मान का निर्णय कविताओं की वस्तु व विन्यास की इसी कसौटी को ध्यान में रखते हुए ही किया जाता है। इसकी निर्णायक समिति में साहित्य के ५ मर्मज्ञ विद्वान सम्मिलित हैं। प्रति वर्ष सितम्बर में इस पुरस्कार के लिए देश-विदेश के हिन्दी रचनाकारों से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं।

अब तक यह पुरस्कार जिन रचनाकारों को प्रदान किया गया है, उनमे अनामिका तीसरी स्त्री रचनाकार हैं। इस से पूर्व सुश्री गगन गिल व सुश्री नीलेश रघुवंशी को इस श्रेणी में गिना जाता था।

सुश्री अनामिका का औपचारिक परिचय इस प्रकार है--


जन्म : 17 अगस्त 1961, मुजफ्फरपुर(बिहार)।
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए., पी.एचडी.।अध्यापन- अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।कृतियाँ : गलत पते की चिट्ठी(कविता), बीजाक्षर(कविता), अनुष्टुप(कविता),पोस्ट–एलियट पोएट्री (आलोचना),स्त्रीत्व का मानचित्र(आलोचना),कहती हैं औरतें(कविता–संपादन),एक ठो शहर : एक गो लड़की(शहरगाथा)पुरस्कार/सम्मान : राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान और साहित्यकार सम्मान

पूर्व वर्षों की भांति यह पुरस्कार आगामी अगस्त माह में बान्दा में आयोजित होने वाले एक भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा

इस पुरस्कार के लिए केदार सम्मान समिति, केदार शोधपीठ न्यास,‘विश्वम्भरा’, ‘हिन्दी भारत’ समूह व हमारी ओर से अनामिका जी को अनेकश: शुभकामनाएँ।

~कविता वाचक्नवी

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चौका
(अनामिका)



पृथ्वी
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़
भूचाल बेलते हैं घर
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।

रोज सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर
एक नई धाह फेंककर
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।
पृथ्वी– जो खुद एक लोई है
सूरज के हाथों में
रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छांह
पकाती हैं शहद।

सारा शहर चुप है
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन।
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी
और मैं
अपने ही वजूद की आंच के आगे
औचक हड़बड़ी में
खुद को ही सानती
खुद को ही गूंधती हुई बार-बार
खुश हूँ कि रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।


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एक औरत का पहला राजकीय प्रवास
(अनामिका)


वह होटल के कमरे में दाखिल हुई
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।
कमरे में अंधेरा था
घुप्प अंधेरा था कुएं का
उसके भीतर भी !

सारी दीवारें टटोली अंधेरे में
लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था
पूरा खुला था दरवाजा
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था
सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो
आर्त्तभाव से उसे देखा
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बंद कर दिया।

जैसे ही दरवाजा बंद हुआ
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल !
“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?” उसने सोचा।

डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं– रीढ़ के भीतर !
तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत ?
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना आदम स्मृतियों का ?

पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था
पर उसने बांची टेलीफोन तालिका
और जानना चाहा
अंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक खर्चा।

फिर, अपनी सब डॉलरें खर्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल।

सबसे पहले अपने बच्चे से कहा–
“हैलो-हैलो,बेटे–
पैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊंघ गए थे कैसे...
सबसे ज्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे !”

अंतिम दो पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
आफिस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से
फिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकती अपनी माँ से।

...अब उसकी हुई गिरफ्तारी
पेशी हुई खुदा के सामने
कि इसी एक जुबां से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा–
“सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे !
”यह तो सरासर है धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा !

लेकिन, खुदा ने कलम रख दी
और कहा–“औरत है, उसने यह गलत नहीं कहा !”

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कूड़ा बीनते बच्चे
(अनामिका)

उन्हें हमेशा जल्दी रहती है
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े-बड़े डग भरते
चलते हैं वे तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूलकर उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का!
बोरियों में टनन-टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से
कभी-कभी कहती हैं-
‘ कैसी हो","कैसा है मंडी का हाल?"
बढ़ते-बढ़ते
चले जाते हैं वे
पाताल तक
और वहाँ लग्गी लगाकर
बैंगन तोड़ने वाले
बौनों के वास्ते
बना देते हैं
माचिस के खाली डिब्बों के
छोटे-छोटे कई घर
खुद तो वे कहीं नहीं रहते,
पर उन्हें पता है घर का मतलब!
वे देखते हैं कि अकसर
चींते भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर
ले जाते हैं अपने घर!
ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है
सिगरेट की पन्नी उनसे ही लेकर।

गूगल इंडिक ट्रांस्लितेरेशन टूल का एच टी एम एल कोड रूप बनाने का यत्न

गूगल इंडिक ट्रांस्लितेरेशन टूल का एच टी एम एल कोड रूप बनाने का यत्न

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गूगल के इंडिक transaliteration टूल का उपयोग वस्तुत: बहुत ही उपयोगी व महत्वपूर्ण है. देवनागरी में लिखने के लिए अनेक लोग इसका नियमित प्रयोग करते हैं. पोस्ट लिखने से लेकर ब्लॉग पर कमेंट्स के लिए पाठकों की सहायतार्थ देवनागरी का यह सरलतम टूल अनेक ब्लोग्स पर प्रयोग में लाया जाता है । i google पर भी मैंने इसे रखा है ताकि किसी अन्य कम्प्यूटर पर भी मैं देवनागरी में लिख सकूँ। दो अड़चनें इसमें आती हैं की यदि इसे इसके वेब पेज/लिंक के अतिरिक्त कहीं प्रयोग किया जाता है तो वहां edit का विकल्प बहुधा नहीं आता। दूसरा यह की गूगल की गैजेट को केवल गूगल के ही संसाधनों के साथ प्रयोग किया सकता है , अन्य स्थलों पर केवल इसका लिंक ही दिया जा सकता है (उदाहरण -वरेण्या ) ।
गूगल यदि इसका HTML कोड उपलब्ध कर देता तो यह समस्या न रहती की अन्यत्र इसका प्रयोग कैसे करें या वेबपेज / होम पेज /लिंक के अतिरिक्त भी इसकी पूरी सुविधा सदा उपलब्ध रहती । मैंने एक दो बार गूगल को इस सन्दर्भ में लिखा भी
अंतत: कल एक आरंभिक प्रयोग इस टूल को HTML कोड के रुप में बनाने का किया। इसमें इसके एडिट वाले विकल्प की मूल सुविधा गैजेट के रुप में प्रयोग करने पर भी सदा सुरक्षित रहती है. साथ ही यह कोड अन्यत्र भी प्रयोग में लाया जा सकता है जहाँ गूगल की विजेट को as it is ( सिवाय माप परिवर्तन के ) प्रयोग नहीं किया जा सकता.
इसका कोड वागर्थ हिन्दी भारत (ब्लॉग के बाहरी साइड-बार से प्राप्त किया जा सकता है. इसे प्रायोगिक उदाहरण के रूप में वहीं प्रयोग भी किया गया है) से प्राप्त किया जा सकता है.

सम्पूर्णता का कोई आग्रह नहीं है इसमें. हाँ, सुविधा लगे तो अवश्य लिखें-बताएँ .
Tags: गूगल इंडिक
Tuesday April 1, 2008 - 03:35pm (IST) Permanent Link | 0 Comments
त्रिलोचन : ‘क्षण के घेरे में घिरा नहीं’ लोकार्पित
त्रिलोचन : ‘क्षण के घेरे में घिरा नहीं’ लोकार्पित magnify
`क्षण के घेरे में घिरा नहीं` का लोकार्पण




हैदराबाद, 8 मार्च 2008


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद परिसर में डॉ. देवराज और अमन द्वारा संपादित पुस्तक `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` के लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित `स्वतंत्र वार्ता` के संपादडॉ. राधेश्याम शुक्ल ने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा कि `कवि त्रिलोचन शब्दों के मर्मज्ञ थे। वे शब्दों पर अंतहीन चर्चा करते थे। शब्दों पर अपने अधिकार के कारण वे ऐसी कविताएँ रच सके, जो देखने में अत्यंत सहज प्रतीत होती हैं, परंतु उनमें लोक और वेद दोनों एक हो गए हैं। इसलिए त्रिलोचन की कविता का समग्र पाठ अभी खुलना शेष है।` उन्होंने कहा कि श्रद्धांजलि के रूप में होते हुए भी `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` शीर्षक पुस्तक त्रिलोचन की कविता के समग्र पाठ की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में देश के विविध क्षेत्रों के कविता प्रेमियों और विद्वानों ने अपने अनुभव, दृष्टिकोण और विचार प्रकट किए हैं। डॉ. शुक्ल ने आगे कहा कि अपने संक्षिप्त कलेवर के बावजूद यह कृति दो पंक्ति के अनुष्टुप की भांति प्रभाव उत्पन्न करने वाली है, क्योंकि इसमें संवेदना का प्राणतत्व विद्यमान है और संवेदना के स्तर पर हमें महाग्रंथों की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। कविता को एक भावक्षण बताते हुए उन्होंने कहा कि त्रिलोचन न तो क्षण के घेरे में कैद हो सकते हैं और न ही युग के घेरे में। उन्होंने त्रिलोचन को अननुकरणीय बताते हुए यह भी जानकारी दी कि वे अवधी के अपनी तरह के इकलौते गद्यकार हैं।

मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कवि पत्रकार डॉ . रामजी सिंह `उदयन` ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक त्रिलोचन को वादमुक्त दृष्टि से देखे जाने की एक नई शुरूआत करती है। इस पुस्तक के हवाले से उन्होंने साहित्यकारों, समीक्षकों व आलोचकों से त्रिलोचन की रचनाओं में मीन-मेख न निकालते हुए उन्हें अपनी अवधूत साहित्यिक परंपरा में जीवित रखने की बात कही।

विशिष्ट अतिथि के रूप में केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. आलोक पांडेय ने त्रिलोचन की इस मान्यता की ओर ध्यान दिलाया कि वे कविता की पूरी पंक्ति लिखने के पक्षधर थे और खोखला होता जा रहा आज का आदमी उनकी चिंता का मुख्य विषय था, क्योंकि वे यह समझ चुके थे कि यह युग कबंध युग है जिसमें सबका सिर पेट में धंसा हुआ है।

पुस्तक का परिचय देते हुए समीक्षक चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने बताया कि `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` में 27 आलेख, एक साक्षात्कार, एक रिपोर्ट और त्रिलोचन की बारह कविताएँ तथा कुछ चित्र सिम्मलित हैं। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से त्रिलोचन के बारे में हिंदी ही नहीं, हिंदीतर भाषी कई साहित्यकारों के भी मार्मिक विचार सामने आ सके हैं।

लोकार्पित पुस्तक के प्रकाशन की योजना का परिचय देते हुए इसकी परामर्श समिति की संयोजक डॉ. कविता वाचक्नवी ने बताया कि उत्तर प्रदेश के स्थान नजीबाबाद से प्रकाशन का यह कार्य विविध प्रकार की तकनीकी असुविधाओं के कारण दुष्कर रहा, तथापि संपादक मंडल के उत्साह और त्रिलोचन के प्रति हार्दिकता के भाव के सहारे उन सबका निराकरण भी हो गया।

आरंभ में कुंकुम, अक्षत, उत्तरीय, पुस्तक तथा लेखनी समर्पित करके अतिथियों का स्वागत किया। डॉ.विनीता सिन्हा, डॉ. मृत्युंजय सिंह, सुनीता, शिवकुमार राजौरिया, शक्ति द्विवेदी, डॉ. घनश्याम , आर. संजीवनी, वंदना शर्मा, सुरेश इंगले, के. नागेश्वर राव, सी. नरसिंह मूर्ति, निर्मल सुमिरता, वी. एल. शारदा, शीला, डॉ. सुनीता सूद, अनुराधा जैन, आशा देवी सोमाणी तथा श्रीनिवास सोमाणी ने पुस्तक पर हुई चर्चा को जीवंत बनाया।

अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए वरिष्ठ कवि और कथाकार डॉ. किशोरी लाल व्यास ने कहा कि सॉनेट परंपरा का हिंदीकरण और भारतीयकरण करने वाले महान कवि त्रिलोचन की स्मृति को समर्पित `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` केवल श्रद्धांजलि भर की पुस्तक नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विराटता का ऐसा सूत्रलेख है जिससे आगामी शोधकर्ताओं को नई दिशा और दृष्टि मिल सकती है।

इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में डॉ.किशोरी लाल व्यास, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. रामजी सिंह `उदयन`, चंद्र मौलेश्वर प्रसाद, सुषमा बैद, बी.बालाजी, तेजराज जैन, गुरुदयाल अग्रवाल, डॉ. एस. दत्ता, मालती, वसंत जीत सिंह, सत्यादेवी हरचंद, कन्हैयालाल अग्रवाल, मनोज कुमार चकोर, वीरप्रकाश लाहोटी सावन, गोविंद मिश्र, भंवर लाल उपाध्याय, आशा मिश्रा, विजय मिश्रा, सूरज प्रसाद सोनी और सविता सोनी ने विविध विधाओं की कविताएँ प्रस्तुत कीं। कवि गोष्ठी का संचालन बी. बालाजी ने त