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धूप- बारिश

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Last updated Fri Nov 02, 2007 Member since April 2005

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अभिव्यक्ति की दुनिया Full Post View | List View

कुछ पल धरती धूप और आकाश के नाम

शहर में बरसात
शहर में बरसात magnify

नगरनामा के अंतर्गत शहरों पर लिखी गई कविताओं में से तीसरी कविता आज पोस्ट कर रही हूँ। साल 2002 , कार के भीतर से दुबई में जहाँ बरसात कभी-कदा ही होती है।

शहर में बरसात हुई
भीगी-सी ठंडी-सी रात हुई

भली लगीं खिड़की पर
शीशे से टकरातीं
कोमल बौछारें
सड़कों पर मंद हुई
तेज़ तेज़ दौड़ रही
कार की कतारें

प्रतिबिम्बित होती हैं बहुरंगी बत्तियां
सजधज बाज़ारों की
बड़े-बड़े ग्लो साइन
बारिश की धारों में अजब समा देते हैं
धुंधलाता है सामने का कांच
कठिन श्रम करते हैं वाइपर
परे सिमटती है
कोलाहल भरी भीड़

छोटे से कैफे में
शीशे गिराता है लड़का
सिमटा मुस्काता सा
कड़ाहे में पलटता है बार-बार
फिलाफल के पकौड़ों को
दौड़-दौड़ कर परोसता है कावा के गर्म प्याले

गहराई सड़कों पर
टिप टिप कर बहुत तेज़
होता है टंकित
नया गीत वर्षा का
कौन है लिपिक?

Tags: नगरनामा
Wednesday September 19, 2007 - 03:52am (GST) Permanent Link | 2 Comments
कितना अच्छा लगता है
कितना अच्छा लगता है magnify
शहरों पर लिखी गई कविताओं में से एक और कविता- रचना का समय है अप्रैल 1990 और रचना है- ' कितना अच्छा लगता है'। चित्र है 'एक सुबह जयपुर में' और चित्र गरमियों का नहीं, किसी गुलाबी सर्दी का है जब जैकेट की ज़रूरत रही होगी पर पहनी नहीं गई होगी और गुलमोहर भी खिले नहीं होंगे।

कितना अच्छा लगता है
जयपुर की सड़कों पर
जाना
रोज़ टहलने
गर्मी के मौसम में तड़के

थोड़े से अंधियारे में
सड़क किनारे
बिछी खाट पर

सोते हैं जन
रंग बिरंगी कथरी ओढ़े
टुकड़ों-टुकड़ों गुथी कला के
सहज फलक से

धीमे-धीमे बहती है पुरवा
अमलतास के
स्वर्ण घुँघरुओं को झनकाती

खिले हुए
गुलमोहरों से ढकी
हलचल रहित स्तब्ध वधूटी जैसी
निर्मल सड़कें
शांत!!

घने यातायातों से दूर
ऊँट गाड़ी का सहज गुज़रना
धीरे-धीरे
झरती हुई नीम के नीचे
कितना अच्छा लगता है
सूरज के आने से पहले
घने शहर में
कोलाहल भर जाने से पहले।

Tags: नगरनामा
Monday June 18, 2007 - 12:14am (GST) Permanent Link | 2 Comments
रंग
रंग magnify

होली के अवसर पर उनके लिए जिन्हें कविताओं की याद आती है इन्सानों की तरह -

जो फागुन में बिखरता है
जो मौसम में निखरता है
वही है रंग

जो होली में फुहारों पर
औ' दीवाली दिवारों पर
वही है रंग

जो दुनिया को लुभाता है
जो महफिल को जमाता है
वही है रंग

हिना में जो बसा करता
जो होंठों पर रचा करता
वही है रंग

ढंग में जो मिला रहता
मंच में भी सिला रहता
वही है रंग

ये दुनिया जिसपे मरती है
औ' जिसमें भंग पड़ती है
वही है रंग

ज़माना जिसमें ढलता है
औ' गिरगिट जो बदलता है
वही है रंग

जो खुशहाली में छाता है
जो गम़ में याद आता है
वही है रंग

जो नर के माथ चढ़ता है
पांव नारी के पड़ता है
वही है रंग

जो उड़ता है उतरता है
बरसता और बिगड़ता है
वही है रंग

Tags: कविता
Sunday March 4, 2007 - 12:21am (GST) Permanent Link | 2 Comments
गुलमोहर दोहे
गुलमोहर दोहे magnify

गुलदस्ते में फूल हैं जंगल में हैं आग
सडकों पर सौंदर्य हैं छाया में अनुराग

फूलों की बारात है गुलमोहर के संग
कलियों वाली डाल पर किसने फेंका रंग

गुलमोहर की छांह का सूरज से संवाद
इस मौसम की साल भर क्यों आती है याद

सडकें जितनी जल रहीं नभ जितना बेचैन
गुलमोहर की छांह में मन को उतना चैन

धीरे धीरे कर रहीं फलियां मीठी बात
गुलमोहर के गात पर पुलकित है वातास

गुलमोहर की छांह में गरमी की चौपाल
फूलों वाले दीप हैं माटी वाला थाल

चंवर डुलाती हिल रही गुलमोहर की बांह
अपना समझे जो हमें आए हमारी छांह

Tags: दोहे
Friday June 16, 2006 - 03:00pm (GST) Permanent Link | 9 Comments
३२ साल बाद
३२ साल बाद magnify

सोचा था कि कल दिन में अभि-अनु का ढेर सा काम हो जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं।

शाम को टोरोंटो से समीर लाल और उनकी पत्नी अपने एक स्थानीय मित्र के साथ मिलने आए। उनकी पत्नी साधना उसी स्कूल की पढी हुई है जहां मैं पढती थी। दो साल छोटी है मुझसे इसलिए पढाई में भी दो साल पीछे थी।  छोटे शहर का सबसे बडा स्कूल था, हम सब एक दूसरे को जानते थे। साधना को खासतौर पर इसलिए क्यों कि उसकी बडी बहन शशि मेरे क्लास में थी। छठे दर्जे से लेकर बी ए तक। उसके बाद शशि की शादी हो गई थी और वह यूएसए चली गई थी १९७४ की बात है यह। ज़िंदगी की रफ्तार वाले दिन... हम सब अपनी अपनी दिशाओं की तरफ बढते हुए एक दूसरे से बिछड गए।

पिछले कुछ सालों से बिछडे लोगों से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ है– अभि अनु की बदौलत। साधना को जब आखीरी बार देखा था वह १६ साल की रही होगी, दुबली पतली सुंदर सी लडकी आंखों में बसी थी। ३२ सालों बाद मिले। चेहरा मोहरा वही। शरारत और संकोच की जगह खुलापन और आत्मविश्वास... देख कर अच्छा लगा। उसने अपने को संभाल कर रखा है। आशा है मेरी सब सहेलियां अभी तक वैसी ही सुंदर होंगी जैसी ३०-३२ साल पहले थीं। खासतौर पर पायल की याद आई।

हम सब आधुनिक विचारों वाली लडकियां थे। घिसीपिटी परंपराओं के विरोध में बोलने वाले। परिवार में भी ऐसा रिवाज़ था कि लडकियां किसी के पैर नहीं छूतीं पर जाने यह परदेस की हवा का असर था या उम्र का तकाज़ा कि कल विदा लेते समय साधना पैर छूने को झुकी और मेरी आंखें भर आईं।

नया अंक आने को है तो शायद दो दिन यहां कुछ भी न लिखा जाए। समीर के कैमरे में कुछ तस्वीरें होंगी। बाद में इस पोस्ट के साथ लगा दूंगी। तब तक मेरे संग्रह में से शुभदा भोंसले की यह कलाकृति।

मन होता है कि इस पोस्ट को कोई पुरानी सहेली पढे और कमेंट में हस्ताक्षर करे। है कोई १९६६ से १९७४ के बीच आर्य कन्या पाठशाला मीरजापुर से?

Tags: अपनी-बात
Wednesday June 7, 2006 - 08:25am (GST) Permanent Link | 2 Comments

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