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कुछ पल धरती धूप और आकाश के नाम
नगरनामा के अंतर्गत शहरों पर लिखी गई कविताओं में से तीसरी कविता आज पोस्ट कर रही हूँ। साल 2002 , कार के भीतर से दुबई में जहाँ बरसात कभी-कदा ही होती है।
शहर में बरसात हुई
भीगी-सी ठंडी-सी रात हुईभली लगीं खिड़की पर
शीशे से टकरातीं
कोमल बौछारें
सड़कों पर मंद हुई
तेज़ तेज़ दौड़ रही
कार की कतारेंप्रतिबिम्बित होती हैं बहुरंगी बत्तियां
सजधज बाज़ारों की
बड़े-बड़े ग्लो साइन
बारिश की धारों में अजब समा देते हैं
धुंधलाता है सामने का कांच
कठिन श्रम करते हैं वाइपर
परे सिमटती है
कोलाहल भरी भीड़छोटे से कैफे में
शीशे गिराता है लड़का
सिमटा मुस्काता सा
कड़ाहे में पलटता है बार-बार
फिलाफल के पकौड़ों को
दौड़-दौड़ कर परोसता है कावा के गर्म प्यालेगहराई सड़कों पर
टिप टिप कर बहुत तेज़
होता है टंकित
नया गीत वर्षा का
कौन है लिपिक?
कितना अच्छा लगता है
जयपुर की सड़कों पर
जाना
रोज़ टहलने
गर्मी के मौसम में तड़केथोड़े से अंधियारे में
सड़क किनारे
बिछी खाट पर
सोते हैं जन
रंग बिरंगी कथरी ओढ़े
टुकड़ों-टुकड़ों गुथी कला के
सहज फलक सेधीमे-धीमे बहती है पुरवा
अमलतास के
स्वर्ण घुँघरुओं को झनकाती
खिले हुए
गुलमोहरों से ढकी
हलचल रहित स्तब्ध वधूटी जैसी
निर्मल सड़कें
शांत!!घने यातायातों से दूर
ऊँट गाड़ी का सहज गुज़रना
धीरे-धीरे
झरती हुई नीम के नीचे
कितना अच्छा लगता है
सूरज के आने से पहले
घने शहर में
कोलाहल भर जाने से पहले।
होली के अवसर पर उनके लिए जिन्हें कविताओं की याद आती है इन्सानों की तरह -
जो फागुन में बिखरता है
जो मौसम में निखरता है
वही है रंगजो होली में फुहारों पर
औ' दीवाली दिवारों पर
वही है रंगजो दुनिया को लुभाता है
जो महफिल को जमाता है
वही है रंगहिना में जो बसा करता
जो होंठों पर रचा करता
वही है रंगढंग में जो मिला रहता
मंच में भी सिला रहता
वही है रंगये दुनिया जिसपे मरती है
औ' जिसमें भंग पड़ती है
वही है रंगज़माना जिसमें ढलता है
औ' गिरगिट जो बदलता है
वही है रंगजो खुशहाली में छाता है
जो गम़ में याद आता है
वही है रंगजो नर के माथ चढ़ता है
पांव नारी के पड़ता है
वही है रंगजो उड़ता है उतरता है
बरसता और बिगड़ता है
वही है रंग
गुलदस्ते में फूल हैं जंगल में हैं आग
सडकों पर सौंदर्य हैं छाया में अनुरागफूलों की बारात है गुलमोहर के संग
कलियों वाली डाल पर किसने फेंका रंगगुलमोहर की छांह का सूरज से संवाद
इस मौसम की साल भर क्यों आती है यादसडकें जितनी जल रहीं नभ जितना बेचैन
गुलमोहर की छांह में मन को उतना चैनधीरे धीरे कर रहीं फलियां मीठी बात
गुलमोहर के गात पर पुलकित है वातासगुलमोहर की छांह में गरमी की चौपाल
फूलों वाले दीप हैं माटी वाला थालचंवर डुलाती हिल रही गुलमोहर की बांह
अपना समझे जो हमें आए हमारी छांह
सोचा था कि कल दिन में अभि-अनु का ढेर सा काम हो जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं।
शाम को टोरोंटो से समीर लाल और उनकी पत्नी अपने एक स्थानीय मित्र के साथ मिलने आए। उनकी पत्नी साधना उसी स्कूल की पढी हुई है जहां मैं पढती थी। दो साल छोटी है मुझसे इसलिए पढाई में भी दो साल पीछे थी। छोटे शहर का सबसे बडा स्कूल था, हम सब एक दूसरे को जानते थे। साधना को खासतौर पर इसलिए क्यों कि उसकी बडी बहन शशि मेरे क्लास में थी। छठे दर्जे से लेकर बी ए तक। उसके बाद शशि की शादी हो गई थी और वह यूएसए चली गई थी १९७४ की बात है यह। ज़िंदगी की रफ्तार वाले दिन... हम सब अपनी अपनी दिशाओं की तरफ बढते हुए एक दूसरे से बिछड गए।
पिछले कुछ सालों से बिछडे लोगों से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ है– अभि अनु की बदौलत। साधना को जब आखीरी बार देखा था वह १६ साल की रही होगी, दुबली पतली सुंदर सी लडकी आंखों में बसी थी। ३२ सालों बाद मिले। चेहरा मोहरा वही। शरारत और संकोच की जगह खुलापन और आत्मविश्वास... देख कर अच्छा लगा। उसने अपने को संभाल कर रखा है। आशा है मेरी सब सहेलियां अभी तक वैसी ही सुंदर होंगी जैसी ३०-३२ साल पहले थीं। खासतौर पर पायल की याद आई।
हम सब आधुनिक विचारों वाली लडकियां थे। घिसीपिटी परंपराओं के विरोध में बोलने वाले। परिवार में भी ऐसा रिवाज़ था कि लडकियां किसी के पैर नहीं छूतीं पर जाने यह परदेस की हवा का असर था या उम्र का तकाज़ा कि कल विदा लेते समय साधना पैर छूने को झुकी और मेरी आंखें भर आईं।
नया अंक आने को है तो शायद दो दिन यहां कुछ भी न लिखा जाए। समीर के कैमरे में कुछ तस्वीरें होंगी। बाद में इस पोस्ट के साथ लगा दूंगी। तब तक मेरे संग्रह में से शुभदा भोंसले की यह कलाकृति।
मन होता है कि इस पोस्ट को कोई पुरानी सहेली पढे और कमेंट में हस्ताक्षर करे। है कोई १९६६ से १९७४ के बीच आर्य कन्या पाठशाला मीरजापुर से?